Santh Kabir Das Dohe – Part 1

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब ।

पल में परलय होएगी, बहुरि करेगा कब ॥
 


ते दिन गए अकारथ ही, संगत भई न संग ।

प्रेम बिना पशु जीवन, भक्ति बिना भगवंत ॥



तीरथ गए से एक फल, संत मिले फल चार ।

सतगुरु मिले अनेक फल, कहे कबीर विचार ॥
 

 

धीरे धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय ।
 
माली सींचे सौ घड़ा, ऋतू आए फल होय ॥
 


प्रेम न बारी उपजे, प्रेम न हाट बिकाए ।

राजा प्रजा जो ही रुचे, सिस दे ही ले जाए ॥